रिपोर्ट -कांता पाल /हरिद्वार – देश का भविष्य बच्चों को कहा जाता है लेकिन हरिद्वार में इन बच्चों के भविष्य के साथ साथ इनका जीवन भी खतरे में है l ये हम नहीं कह रहे ये उस जगह में हालात बयाँ कर रहे हैं, जहाँ ये रोज़ाना शिक्षा ग्रहण करने आते हैं जी हाँ हम बात कर रहे हरिद्वार के उन सरकारी स्कूलों की जहां के भवन जर्जर होने के कारण बच्चों के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं l कभी भी शिक्षा के ये मंदिर बच्चों की कब्रगाह बन सकते हैं लेकिन यहाँ के शिक्षा विभाग को शायद ये नज़र नहीं आता हरिद्वार के तमाम सरकारी स्कूलों की बिल्डिंग जर्जर अवस्था में है कहीं टेंट के नीचे पढ़ने को मजबूर है मासूम बच्चे तो कहीं खुले आसमान के नीचे।
शिक्षा के अधिकार को भारत के संविधान में मूलभूत अधिकारों में शामिल किया गया है सरकार हर साल करोड़ों रुपया शिक्षा के नाम पर खर्च करने का दावा भी करती है लेकिन क्या ये शिक्षा मासूम बच्चों की ज़िन्दगी दांव पर लगाकर दी जा रही है हरिद्वार के कुछ स्कूल के हालात तो कम से कम यही बयां कर रहे हैं हरिद्वार ज्वालापुर स्थित राजकीय प्राथमिक नंबर 12 स्कूल के टीचर सुधीर चौबे का कहना है कि हमारे स्कूल की बिल्डिंग जर्जर अवस्था में है जिस तरह की सुविधा दी जा रही है उसी हिसाब से बच्चों को पढ़ाया जा रहा है क्लास रूम की छत गिरने के कारण बच्चों को बाहर पढ़ाया जाता है स्कूल किराए पर है इस कारण मरम्मत का कार्य भी नहीं हो पा रहा है अधिकारियों द्वारा कई बार इसका निरीक्षण किया गया मगर अब तक कोई कार्य नहीं हुआ यह स्कूल तकरीबन 40 से 50 साल पुराना है।
वहीं इस मामले पर बेसिक शिक्षा अधिकारी शिव प्रकाश सेमवाल का कहना है कि विभाग द्वारा जर्जर अवस्था के स्कूलों का निरीक्षण किया गया है शासन द्वारा भी निर्देशित किया गया है कि जर्जर अवस्था के स्कूलों का डाटा शासन को उपलब्ध कराया जाए हमारे लिए भी काफी बड़ी चुनौती है जल्द से जल्द जर्जर अवस्था वाले स्कूलों को सही कराना विभाग द्वारा वैकल्पिक रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं l जिले में कई सरकारी स्कूलों की मरम्मत के लिए प्राइवेट संस्था की आगे आई है और उनके द्वारा कार्य कराया जा रहा है इनका कहना है कि कई सरकारी स्कूल प्राइवेट किराए पर है ज्वालापुर स्थित एक स्कूल की जमीन का मामला कोर्ट में चल रहा है इस कारण वहां निर्माण कार्य भी नहीं हो पा रहा है।
इसे गरीबी की मार ही कहेंगे अपने कलेजे के टुकड़ों को परिजन रोजाना मौत के मुंह में भेजते हैं इस आस के साथ की कभी वे भी बड़े इंसान बनेगे लेकिन खौफ के साये में बच्चे कितना पढ़ पा रहे हैं ये आपके सामने है अब देखना ये होगा की क्या बदहाल स्कूलों की हालत सुधर पायेगी या शासन और प्रशासन की नींद किसी बड़े हादसे के बाद ही टूटेगी l

























