नैनीताल – स्कूल जाने में जान का जोखिम उठाते हैं ये बच्चे

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कान्तापाल/ नैनीताल – उत्तराखण्ड के नैनीताल में एक गाँव ऐसा है जहाँ के छात्र छात्रा अपना भविष्य बनाने के लिए मौत की इस उफनती नदी को हर रोज पार कर स्कूल आते जाते हैं। ये मासूम तो हररोज ‘ब्लू व्हेल ‘ जैसा मौत का ये गेम खेलने को मजबूर हैं। नदी के तेज बहाव में स्कूल जाते और घर लौटते हुए इन नाबालिग बच्चों की तस्वीरों को देखकर आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं की इस दौरान हर एक बच्चे की जिन्दगी किस कदर खतरे में है। यहाँ के बच्चे तीन माह तक स्कूल जाने के लिए पानी के कम होने का इंतजार करते हैं। इस गाँव के लोग भी सरकारों से गुहार लगाते लगाते थक गए हैं। राज्य बनने के 17 साल
बाद भी इनकी गुहार न ही प्रशासन तक नही पहुंच पाई और न ही सरकार तक l

मण्डल मुख्यालय नैनीताल से महज 60 किलोमीटर की दूरी पर बसे हैड़ाखान के उडवां गांव के लोग गौला नदी को पार करने को मजबूर हैं। यहाँ बुजुर्ग, बीमार और स्कूली छात्र छात्रा इस तेज बहाव वाली गौला नदी को पार कर शहर के अस्पताल, स्कूल और बाजार तक पहुँच पाते हैं। यूँ तो उत्तराखण्ड में ऐसे कई गाँव हैं जिनका शहरों से संपर्क बगैर पुल वाली नदी, नालों या रपटों को पार किये सम्भव नहीं हो पाता है। भीमताल ब्लॉक के उडवां गांव के 60 परिवारों के बच्चे इस जोखिम भरी चुनौती का बचपन से ही मुकाबला करने को मजबूर हैं। ये बच्चे हररोज नदी पार कर हैड़ाखान गाँव के श्री.श्री.1008 हैड़ाखान महाराज इंटर कॉलेज पढ़ने के लिए आते जाते हैं। गाँव के बड़े छात्रों को बुजुर्गों द्वारा छोटे बच्चों और किशोरियों को नदी पार कराने की जिम्मेदारी दी गई है जिसे आज तक वो बखूबी निभा रहे हैं। ये सीनियर छात्र कक्षा चार से आठ तक के बच्चों को ना केवल अपनी गोद में नदी पार कराते हैं बल्कि उनके स्कूली बस्तों को भी बिना भिगाए हुए सुरक्षित पार पहुँचाते हैं, नदी पार करने से पहले ये एक प्लास्टिक की बोरी में अपने बैग और कपड़ों को रखते हैं l   बता दें कि कुछ वर्ष पूर्व ग्रामीण बाली राम की इसी नदी के तेज बहाव में डूबकर मौत हो गई थी ।

नदी के अत्यधिक तेज बहाव का एक मुख्य कारण ये भी है कि  गाँव के रास्ते से ठीक पहले इसमें तीन नदियों का संगम है। इसमें पूरब से आने वाली लुगड नदी, दक्षिण पूरब की तरफ से आने वाली कलसा और गौला नदी के साथ मिलकर ये नदी विकराल रूप ले लेती है और गौला नदी कहलाती है । नदी का रूप इतना विकराल है की पानी कम होने के इंतज़ार में बच्चे कई बार अपना खाना भी नदी के किनारे बैठकर खाते हैं।
लक्ष्मी, दीपाली, दीपक इन बच्चों का कहना है कि वो अपना भविष्य बनाना चाहते हैं लेकिन बरसातों के दौरान तीन माह तक नदी में पानी बढ़ने से उनकी पढाई का बेहद हर्जा हो जाता है और उनका कोर्स छूट जाने से वे पिछड़ जाते हैं। बच्चे इस नदी को पार करते समय लगे डर के एहसास को भी बताते हुए डरते हैं।

क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीण बताते हैं की उन्होंने जिलाधिकारी के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकार से नदी के ऊपर झूला पुल या स्थाई पुल की मांग की है। उन्होंने बताया की उन्हें पुल नहीं होने के कारण कई समस्याएं आती हैं। बच्चों की जिन्दगी संवारने के लिए उनकी जिन्दगी दांव पर पगानी पड़ती है। उन्होंने बताया की क्षेत्र में इस स्कूल के अलावा 30 किलोमीटर के दायरे में कोई स्कूल नहीं है। नदी के तेज बहाव की वजह से बहुत ज्यादा बीमारों को भी चार लोग चारपाई पर रखकर नदी पार कराते हैं जिसमें सभी पांच लोगों के बहने का खतरा बना रहता है। गांव के कई बुजुर्ग तो इस खतरे के कारण वर्षों से गाँव से बाहर ही नहीं निकले हैं। इसके अलावा गांव में पैदा होने वाली दाल और सब्जी भी नदी के पानी से खराब होने के डर से गांव में ही पड़े पड़े खराब हो जाती है जिससे गांववासियों की आर्थिकी भी सुधर नहीं रही है। बच्चों के लिए उन्होंने बताया की जबतक उनके बच्चे हररोज सकुशल घर लौटकर नहीं पहुँच जाते वो लोग टकटकी लगाए उनकी राह देखते रहते हैं । नदी का ये रूप तब है जब पहाड़ी क्षेत्रों में दो दिनों से बरसात थमी हुई है l

इस पूरे मामले में जिला प्रशासन का कहना है कि ये बात सच है हालांकि उन्होंने बताया कि एक प्रस्ताव तो भेजा गया है जिसे अभी तक स्वीकृति नहीं मिल सकी है । उन्होंने ये भी बताया कि इस नदी पर आगे चलकर
जमरानी बांध प्रस्तावित है जिससे ये क्षेत्र डूब क्षेत्र में तब्दील हो  जाएगा।